Father’s Day Special !!

साथ चले दो मजबूत कदमimages (2)
जब दो नन्हे क़दमों के
चल पड़ी जिंदगी सरपट
दुनिया की महकी राहों पे।
          ऊँचे नीचे रस्ते थे
          धूप  छाँव के फेरे थे
          पर साथ हमेशा राहों में
          थामे मुझको दो हाथ तुम्हारे थे।
संघर्षों के पथ थे
हार जीत के मौसम थे
पर साथ हमेशा हर मौसम में
प्रेरित करते दो नैन तुम्हारे थे।
            दुविधा के छाये बादल थे
            बेचैनी के मंजर थे
            पर साथ हमेशा हर मंजर में
            प्यार भरे हर बोल तुम्हारे थे।
अरमानों के मेले थे
अनदेखे अनजाने निर्णय थे
पर साथ हमेशा हर निर्णय में
राह दिखाते जीवन सूत्र तुम्हारे थे।
              साथ चले दो मजबूत कदम
              जब दो नन्हे क़दमों के
              उड़ने लगी जिंदगी
              आसमान की बाहों में।

Nani Ka Ghar

family-vacation

आज स्कूल का आखिरी पेपर है, कल से गर्मी की छुट्टी शुरू हो रही है पूरे दो महीने की। बस कुछ देरऔर बाकी  है छुट्टी की घंटी बज़ने में, लेकिन मन कँहा इंतज़ार करने वाला है घंटी बज़ने का, वो तोकब का घर पहुँच चुका है। मम्मी ने सब तयारी कर ली होगी, सब सामान रख लिया होगा बस हमलोगों  को गर्मी की छुट्टी के होमवर्क के लिए अपनी किताब कॉपी रखनी होगी और मम्मी कुछ भूली तोनहीं होगी रखना जो जो रात को बताया था हम लोग ने.… घंटी बज़ गयी.. मन एक झटके में वापसकक्षा में, पर अबकी बार मुझे भी अपने साथ ले चलने के लिए. अपनी अपनी सहेलियों को २ महीने केलिये टाटा करके मैं और ऋचा (मेरी छोटी बहन) छोटे छोटे मगर तेज कदमों से घर की ओर चल पड़े,मन तो बस दो कदम में घर पहुँच जाना चाहता है. कल मम्मी ने कहा था कि  अगर स्कूल से आने में देरहो गयी तो आज नहीं चलेंगी लेकिन अगर आज नहीं चलेंगी तो छुट्टी का एक दिन वेस्ट हो जाएगा।इसी उधेङबुन में घर आ गया, दौड़ के घर के अंदर पहुंचे , मेज पर बैग पैक रखा है,  ख़ुशी हमारेचेहरों  पर साफ़ झलक रही है; ये खुशी पेपर खत्म होने की नहीं है.. २ महीने की छुट्टी की भी नहींहै…ये ख़ुशी तो है गर्मी की छुट्टी में नानी के घर जाने की। ‘नानी का घर’ ये शब्द ही चेहरे पे मुस्कानलेन के लिए काफी है ।  आधे घंटे के भीतर हम लोग खाना खा के निकलने के लिए तैयार हो गए।

गली के बाहर ही सड़क पार से लखनऊ के लिए बस मिलती है । एक फुलटिकट और दो हाफ टिकट हम चारों  (मम्मी और हम तीनो भाई बहिन) के लिए और एक उमंग औरउत्साह से भरा कानपुर से लखनऊ का सफर शुरू हो जाता है। उन दो घंटों में न जाने कितनी बार हममम्मी से पूछते कि और कितनी देर लगेगी लखनऊ आने में । हमारी बेचैनी देख के आस पास की सीटवाले अंकल लोग भी समझ जाते कि  लगता है बच्चे नानी के घर जा रहे हैं, शायद उन्हें भी अपनेबचपन के दिन याद आ जाते होंगे । डेड़ घंटे बाद जैसे ही सड़क के डिवाइडर पर फूलों से ढके हरे रंग केजंगले दिखना शुरू होते, नानी के घर पास आने का एहसास और तेज हो जाता । लखनऊ पहुँच करचारबाग बस अड्डे पे उतरकर वंहा से लालकुआं चौराहे  के लिए एक रिक्शा करना होता ।  रिक्शे पेबैठे बैठे सबको सरप्राइज़ देने का पूरा सीन दिमाग में कई बार प्ले हो जाता।  बस एक छोटी सी चिंतारहती , मामा का सुभाष जनरल स्टोर चौराहे पर ही है ; कंही रिक्शे से उतरते टाइम नाना या मामादुकान से देख न लें, अगर देख लिया तो सरप्राइज़ थोड़ा फीका रह जाएगा। रिक्शा को सड़क के इसओर एक नाइ की दुकान की ओट में रुकाकर हम उतरते  और जब तक मम्मी रिक्शा वाले भैया को पैसेदेती हम तीनो वो दौड़ लगाते  दुकान की ओर, तीनो में कोई भी एक दूसरे से १ सेकंड भी पीछे नहींरहना चाहता । नाना दुकान के बाहर ही एक पत्थर पर बैठे मिल जाते, हम लोगों को देख कर उनकी ख़ुशी का ढिकना न रहता, एक साथ तीनों को सीने से चिपका के कहते अब घर पूरा हो गया।  दुकानके अंदर से मामा की खुशी उनकी उस प्यारी से मुस्कान में साफ़ दिखाई देती।

नाना मामा के बाद अब घर के बाकी लोगों को चौकाने की बारी आती। घरका दरवाजा दुकान के बगल से जाने वाली एक पतली सी गली में खुलता था। उस गली में घुसते हीबाएं हाथ पे दरजी अंकल की दुकान पड़ती, दाहिनी तरफ पान वाले अंकल की।  सबसे मिलते हुए घरके दरवाजे पे पहुँचते। घर का दरवाजा दिन में हमेशा खुला ही रहता।  उस लकड़ी की चौखट से अंदरघुसते ही लाल ईटों का बड़ा सा आँगन है , आँगन में बाएं साइड एक पंडित जी का परिवार किराये पेरहता है।  आँगन पार कर के लाला ईटों की दो सीढ़ियां हैं दोनों सीढ़ियों के बीच में एक दरवाजा खुलताहै जँहा नाइ अंकल का परिवार रहता है। सीढ़ियों से उपर जाके एक आंगन मे बड़ी नानी का घर है,बगल मे एक और परिवार किराये पे रहता है, उस आंगन से ३ फुट के दरवाज़े से जुड़ा हुआ दुसराआंगन है जंहा नानी का घर है उसके बगल मे एक और परिवार किराये पर  रहता है  , कहने को तो येसब लोग किरायेदार हैं लेकिन घर के सदस्य जैसे ही हैं।  उस घर के अंदर जैसे एक अलग दुनिया है । एक सौ साल पुराना घर , ७-८ परिवार, कई पीढ़ियों से एक साथ उस घर में रहते आ रहे हैं सब एकपरिवार की तरह।  घर के सामने एक बहुत पुराना मुसलमानोँ का हाता है , उसमेँ भी कम से कम १०-१२ परिवार साथ रहते । उसी हाते में एक गूंगी औरत भी रहती थी, मम्मी को देखते ही अपने छज्जे सेही इशारों मे जाने क्या क्या बातें करती रहती थी। सारे घर के हालचाल पूंछ डालती थी।

क्यों की गर्मी के दिन थे इसलिए घर के सब लोग नानी, मामी, दोनोंमासी, सारे कजिन श्रद्धा, ज्योति, प्रेरणा, उपासना सब नीचे के कमरे मे ही होते थे । घर के दरवाज़े सेहम लोगों की आवाज़ जैसे ही  आंगन से लगे हुए कमरे मे पहुँचती कि हल्ला गुल्ला शुरु हो जाता।आँगन का मिलन समारोह देखने वाला होता । उस दिन तो बातों का जो सिलसिला शुरु होता वो रातको ही जाके खतम होता।

सुबह सुबह सब बच्चे नाना के साथ पार्क मे टहलने जाते , वंहा मौसी जी जो किहम बच्चों कि लीडर थी हम लोगों को तरह तरह के खेल खिलवाती, इतने मज़ेदार खेल होते कि आसपास के सारे बच्चे झुण्ड बना के हमारा खेल देखने लग जाते, धीरे धीरे वो बच्चे भी  हमरे खेल मेशामिल हो जाते। वापस आके सुबह रसोई मे नाश्ता करने बैठते तो ऐसा लगता जैसे कोई त्योहार हो।लम्बी सी पंगत में बैठ के सब लोग एक साथ नाश्ता करते।
दोपहर भर हम बच्चों कि धमाचौकड़ी चलती रह्ती, कभी घर घर वालाखेल, कभी टीचर टीचर, कभी रामायण महाभारत की कहानियों पे नाटक तैयार करना ,  शाम कोबाकायदा स्टेज  तैयार करके पूरी साज सज्जा के साथ नाटक का मंचन करना।  दर्शकों की तो कमी थीनही। मकान के सब लोग हमारा नाटक देख्ने आते।  खूब तालियां बजती।  नाटक खत्म होने पर सबकीतरफ़ से कुछ न कुछ इनाम मिलता।  नाना की तरफ से नुक्कड़ कि लस्सी पिलाने ले जाना , दोपहर मेसबके लिये मटके वाली कुल्फी , मामा का केक और पेस्ट्री लाना, और भी न जाने कौन कौन से खेलबना लेते , कभी घर के सारे जुते चप्पल इकठ्ठा करके सही जोड़ियां ढुंढने की प्रतियोगिता, कभी कपड़ोंके ढेर से १ मिनट  के अंदर अच्छी तरह से तैयार होने की प्रतियोगिता , कभी अण्णाज़ के ढेर मे छुपेसामानो को ढ़ूंढ़ना , कभी पानी पीने का कम्पटीशन , कभी गुब्बार फोड़ने का कम्पटीशन … बहुतलम्बी लिस्ट है।  कभी घर के हर सदस्य के उपर पैरोडी बन के सुनना।  दिन काम पड़ जाते पर हमारेखेल खतम होने का नाम न लेते . बस कैमरे की कमी रह गयी. , न कोइ तस्वीर है न कोइ वीडयो बसजो है सब यादों मे बस के रह गया।

दोपहर को घर मे कुछ देर कुटीर उद्योग भी चलता, कभी थर्माकोल कीघडी, मछली, मोर और न जाने क्या क्या बनाके सजाना जिनकी जुलाई मे स्कूल खुलने पर दुकान मेंबहुत माँग होती थी , कभी मीठी सौंफ के पैकेट भरना, कागज के लिफाफे बनाना, जो भी करते खेल हीलगता।

शाम को नानी का सत्तू का डिब्बा ले के बैठना , जितनी बार भी सानेकम पड़ जाना , गरम गरम अनरसे कि गोली बनवा  के लाना, फ़ालसे, जामुन और लीची बाद मे लीचीकि गुठली से बिरंगी बना के खेलना.  वंहा कितना कुछ करने को था, कभी बोर होने क टाइम ही  नही था.  दो महीने इतनी जल्दी बीत जाते;  लेकिन वो दो महीने हमे साल भर के लिये तरोताज़ा कर देते। कुछ तो बात थी नानी के घर मे जो भी  वंहा आता, अपनी सारी परेशानियां भूल के दिल खोल केहँसता, जब वापस जाता तो चेहरे पे एक नयी ताज़गी और उमंग के साथ।

Travel experiences of my life which make me believe that "life is beautiful"